Wednesday, 7 December 2016

डर से लड़ो !

‘डर’, आपमें से बहुत से ऐसे लोग होंगे जिन्हें कई सारी चीजों से डर लगता होगा| कुछ लोगों को काफी छोटी-छोटी चीजों से डर लगता है तो कुछ लोगो को काफी बड़ी चीजों से, वास्तव में किसी भी व्यक्ति का डर छोटा या बड़ा नहीं कहा जा सकता क्यूंकि हमें नहीं पता कि किन परिस्थितियों से उनका यह डर जन्मा है|

अक्सर लोग अपने डर को छिपाने के लिए अनेकों हथकंडे आजमाते है, या नए-नए बहाने बनाते है ताकि उस डर से उनका सामना ना हो और वो एक बार फिर से उस डर के साथ लुकाछिपी खेलकर जीत जाए| अगर किसी ने समंदर के लहरों को गौर से देखा हो तो ऐसा लगता है जैसे वो लहरें हमारी तरफ आ रही है, अब हमें बहा कर ले जाएगी, और सब तहस-नहस हो जाएगा परन्तु ऐसा कुछ नहीं होता, लहरें आती है और जाती है और हम वहीं खड़े आनन्द उठाते है| इसी तरह हमारे डर से हमें इतना भय होता है कि हम सोच लेते है अब हमारा कुछ नहीं हो सकता और उसी डर को पूरी जिंदगी अपने साथ लेकर चलते है|

अकेले रह जाने का डर, किसी को दुबारा ना देखने का डर, अपनों से अलग हो जाने का डर, हम कई बार अपने आप को मजबूत बनाते है और फिर से कमजोर पर जाते है| शायद हम डरते है कि लोगों को हमारी कमजोरी का पता ना चल जाए| जैसे-जैसे हम बड़े होते है, जिम्मेदारियाँ बढती जाती है और हमारा समय बटने लगता है| एक समय ऐसा आता है जब हमारे पास खुद के लिए भी वक़्त नहीं होता और क्या पता हम वक़्त निकालना नहीं चाहते कि कहीं फिर उसी डर से हमारी मुलाकात ना हो जाए|

Friday, 11 November 2016

मेरी सोच


इस बदलाव भरी दुनिया में अपनो को पहचानू कैसे, 
हँसते हुए मुखौटों के बीच अकेलेपन को मिटाऊ कैसे? 

बदलाव संसार का नियम है यह कहकर बदल गए जो, 
उन्हें इस बदलाव की पीड़ा का एहसास कराऊ कैसे?
 
उदासी का बोझ लिए जो अकेला आगे बढ़ रहा है, 
अपनी मुस्कुराहट से उसकी हिम्मत बढ़ाऊ कैसे?

मन पर काबू रख अपनों की ख़ुशी के लिए जी रहा जो,
उसे उसकी अच्छाई से मुलाकात कराऊ कैसे?

अपनों को याद कर जब कभी ऑंखें नम हुई, 
उन्ही अपनों को एक बार याद करना सिखाऊ कैसे? 

इस फरेब भड़ी दुनिया में पत्थर का बन गया जो,
उसे उसके दिल की मासूमियत से दोस्ती कराऊँ कैसे?
 
कभी सूर्य के किरणों सा तेज तो कभी चंद्रमा के ठंडक सा नर्म, 
उसे उसकी आदतों का ज्ञात कराऊँ कैसे? 

सबकी उम्मीदों के बीच हँसना भूल गया जो,
उम्मीद अपने ही करते है यह समझाऊ कैसे? 

रास्तों के अँधेरे में भी अडिग रहा जो, 
उसे मंजिल के उजाले से साक्षात्कार कराऊँ कैसे?

सपने देखते देखते जो आँखें सपने बुनना सिख गयी, 
उन्हें हकीकत की ज़मीन पर जगह दिलाऊ कैसे?

Tuesday, 11 October 2016

खूबसूरत कृतियाँ

आज उसी खिड़की से अपनी गली देख रही हूँ जहाँ हमारा बचपन बीता था। जिन गलियों में हम खिलौनों के पीछे दौड़ा करते थे। कल जहाँ बच्चों के चहकने और खेलने की आवाज आती थी वही आज लोगों के भागने और चिलाने की गूंज सुनाई दे रही है।

पहले कुछ समझ नही आया कि आखिर हो क्या रहा है? घर वालों से पूछने पर पता चला हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो रहे हैं। दो ऐसे कौम की लड़ाई जो सदियों से चली आ रही है। जहाँ भाईचारे की गूंज सुनाई देनी चाहिए वहां नफरत के कसिने पढ़े जा रहे थे। जो हाथ एक दूसरे को गले लगाने के लिए उठने चाहिए, वो हाथ एक दूसरे के सर कलम करने को उतारु थे।

देखते ही देखते वो मासूम सी आवाज खौफ भड़े स्वर में तब्दील हो गयी। उसी खिड़की से दूर देखा तो एक ठेले वाला जल्दी में ठेले ले कर भाग रहा था। उसके चेहरे पर डर के भाव तो थे परन्तु एक परेशानी और उदासी भी थी। लोग दंगे कर के भूल जाते है, उन दंगो के कड़वे नतीजों को नजरंदाज कर आगे बढ़ जाते है।

कभी सोचा है इन दंगों में उन लोगों का क्या होता होगा जिनके घर के चूल्हे पुरे दिन की आमदनी पर निर्भर करते है। जिनके बीवी, बच्चे हर शाम का बेसब्री से इंतजार करते है ताकि उनके पिता या पति अपने दिन भर की कमाई से उनके लिए कुछ ले कर आए। इन दंगों का पूरा असर उन गरीबों के रोजमर्रा की जिन्दगी पर पड़ता है।

हम सब खुदा की देन है, उनकी खूबसूरत कृतियाँ है। कृप्या खुदा के इन मनमोहक पन्नों को अनेक धर्मो के खून से लहूलुहान ना करे। बरसों से चली आ रही दुश्मनी के अंधेरे को एक सूरज की किरण प्रदान करें ताकि फिर से किसी गरीब के आँगन में उस खून के छीटें ना जाए और फिर से कोई परिवार भूखा ना सोए।

Sunday, 2 October 2016

संघर्स और सफलता

मै कश्मीर से हूँ, पाकिस्तानी हूँ| रीन्टू सरदार जी के ये कहते ही सब हँसने लगे| सरदार जी का जन्म कश्मीर में हुआ इसलिए उन्हें लोग पाकिस्तानी कहकर चिढ़ाते है| उनकी उम्र लगभग ४५ वर्ष होगी| एस.पी.वाई.एम के मुख्य कार्यालय वसंतकुंज के नशामुक्ति केंद्र में अपना इलाज करवा रहे रीन्टू सिंह से बातें कर के यह समझ आया कि अगर इंसान दृढ़ संकल्प कर ले तो कोई काम मुश्किल नही होता| यह नशामुक्ति केंद्र २० साल के ऊपर के पुरुषों के लिए नियुक्त है जहाँ लोगों को नशामुक्ति के लिए 3 महीन इलाज के लिए रखा जाता है और उन्हें नशामुक्त होने के लिए प्रेरित किया जाता है| सरदार जी भी उनमें से एक है| १९८९ में कश्मीर से दिल्ली आए रीन्टू शालिमार्ग बाघ के केन्द्रीय विद्यालय में आठवी कक्षा में पढ़ते थे| बचपन में गलत दोस्तो के संगत में आने के कारण उन्हें शराब की लत लग गयी| घरवालों ने इसी आदत की वजह से दशवीं कक्षा में फिर से उन्हें कश्मीर बुला लिया| कश्मीर में आसानी से शराब ना उपलब्ध होने के कारण कुछ सालों के लिए उनकी आदतें छुट गई थी| परिवार के दिल्ली में बसने के कारण उन्हें फिर से दिल्ली आना पड़ा| खुद से बड़े उम्र के लोगों से दोस्ती के कारण शराब की लत ने उन्हें इस क़दर जकर लिया कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो इस दलदल से निकल नही पाए| शुरुआत में शराब से अंदरूनी ख़ुशी महसुस करने वाले सरदार जी को शर्म का एहसास तब हुआ जब उन्हें उनके घरवालों ने ही बेवड़ा बुलाना शुरू कर दिया| शादियों या किसी सम्मेलनों में जब अपनी पत्नी और बच्चे के सामने उन्हें इस लत के लिए जलील होना पड़ा तब उन्हें अपनी गलती की समझ आई| कहते है किसी भी शुभ काम के शुरुआत के लिए कभी भी देर नही होती| जब भी अपनी गलती का एहसास हो तभी उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए| कनाडा में रहने वाली उनकी बहन ने उन्हें एस.पी.वाई.एम संस्था के बारे में जानकारी दी| एस.पी.वाई.एम के निर्देशक डाँ राजेश से सम्पर्क करने के बाद उन्हें संस्था के नशामुक्ति केंद्र के बारे मे पता चला| २०१४ में इस संस्था से जुड़ने के बाद सरदार जी को अपने अन्दर बहुत से परिवर्तन का एहसास हुआ| एक घंटे के ध्यान की कक्षा से लोगों को अपने अंतरात्मा में झाकने का मौका दिया जाता है| ‘जस्ट फॉर टुडे’ नामक कक्षा में सभी को अपने-अपने अनुभवों को बांटने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है| इस कक्षा में आने की अनुमति किसी भी बाहर वाले को नही दी जाती ताकि वहाँ के लोग अपने अनुभवों को बताने में असुविधाजनक परिस्थितियाँ ना महसुस करें| २०१४ में 3 महीने के इलाज के बाद सरदार जी ने ऑटो रिक्शा चलाना शुरू कर दिया| आर्थिक तंगी और नाकामयाबी की वजह से शराब के गंदे लत ने फिर से उन्हें वश मे कर लिया| जैसे-जैसे समय बीतता गया स्थिति बद से बत्तर होने लगी| हाल ये हो गया कि यदि एक दिन भी नशा करने को ना मिले तो उनके हाथ पांव कांपने लग जाते थे| जिनके दिन की शुरुआत ही नशे से हो उनकी जिंदगी का अंदाजा कोई भी लगा सकता है| निरश्ता से भरी ऐसी जिन्दगी को यदि कोई व्यक्ति जीने का नाम दे तो इससे मुर्खता वाली बात हो ही नही सकती| आज अपने आप को मुर्ख कहने वाले सरदार जी मेरी नजर में एक बहुत ही मजबूत इरादे वाले व्यक्ति है जिन्होंने एक महीने पहले दुबारा एस.पी.वाई.एम में आने का सामर्थ्य दिखाया| जब मैंने उनसे पूछा वो किसके लिए बदलना चाहते है? तुरन्त ही मुझे जवाब मिला अपने पत्नी और बच्चों के लिए| अंत में उन्होंने बस एक   बात कही ‘यदि ढेरों कोशिशो के बाद भी आपको खुद में कोई सुधार ना दिखे तो खुद के लिए नही जो आपसे प्यार करते है उनके लिए बदलो, अपने आप हिम्मत मिलेगी| रीन्टू सिंह जैसे बहुत से ऐसे लोग वहां मौजूद है, जिन्हें एस.पी.वाई.एम संस्था द्वारा सुखद जीवन व्यतीत करने की एक नयी उम्मीद मिली है|  

Saturday, 1 October 2016

मेरी मंजिल

अपनी राहें बनाती हूँ,
अपनी मंजिल ढूँढती हूँ|

ढूँढने को सही रास्ता,
जिन्दगी से चलने का सलिका सीखती हूँ|

ठोकर लगती है पर,
खुद को सँभालती हूँ|

अपने विचारों में वास्तविकता लिए,

अपनी तन्हाइयों को खुद से बाटती हूँ|

 

दुखों के बरसते शोले देखती हूँ,

सुखों की ठंडी बुँदे महसूस करती हूँ|


मर्जी की राह पर काटें भी देखती हूँ,

रूकती हूँ, पर मंजिल याद करती हूँ|

 

काटों के बाद नर्म घास पर चलती हूँ,

दर्द की आड़ में सुखद एहसास ढूँढती हूँ|

 

किसी प्रशंसा की चाह नहीं,

पर खुद का विश्वास जगाती हूँ|

 

हिमालय के समान अडिग होती हूँ,

नदियों की तरह उछलती हूँ|

 

चोटों की परवाह नहीं,

तभी आगे की परवाह करती हूँ|

 

सामने मंजिल पाती हूँ तो मुड़कर,

वो रास्ते देखती हूँ|

 

ठंडी सांसे भरती हूँ,

वापस दिनों को याद करती हूँ|

 

मंजिल मिलती है,

अपना अस्तित्व पाती हूँ|

 

जीवन की सच्चाई देखती हूँ, तो जानती हूँ,

निराधार से उचित आधार है|

 

सब कपोलकल्पित है, चल कर देखती हूँ,

पर जिन्दगी मिली है, फिर से जी उठती हूँ|

 

 

 

 

 

  





Saturday, 17 September 2016

फूल और हम

आज भी जब उन फूलों को गिरा देखती हूँ, 
एक अपनापन सा लगता है|
कभी ये फूल भी खिलते होंगे,
अपनी खुशबू से सबको मंत्रमुग्ध करते होंगे|


कभी किसी के चेहरे की मुस्कान बनकर,
तो कभी किसी के बालों की खूबसूरती|
कभी किसी की दोस्ती की शुरुआत बनकर,
तो कभी किसी के प्यार की मंजिल|
कभी किसी के घर की शोभा बनकर,
तो कभी किसी के शव की श्रद्धांजलि|


इस तेज दौड़ती दुनिया में ना जाने कितने पैरों ने इन्हें कुचला,
ना जाने कितनी बार हमें दर्द भरी आह से पुकारा|
उस दर्द को अनसुना कर जब हम आगे बढ़ते गए,
फिर भी हमारी अंतिम सांस तक हमें सजाया|


आज भी जब उन फूलों को मुरझाए देखती हूँ,
एक अपनापन सा लगता है|
कभी ये फूल भी चेहकते होंगे,
साथी तितलिओं संग खेलते होंगे|


कुछ लोग भी इन्ही फूलों के सामान है|
जो दूर रह कर भी अपनी सादगी से सबका दिल छु जाए,
जो अपने रंगों से इन्द्रधनुष बना जाए|
कद्र करे उन लोगों की जो आस पास ना होकर भी,
आपका साथ निभा जाए|

सपनों की उड़ान

अमीरों के लिए विलासिता,
गरीबों के लिए दो वक़्त की रोटी|
मध्यम वर्गियों के लिए सिर पे छत,
जिन्दगी को जीने का नाम देने के लिए ना जाने हम कितने वर्गों में बटें है|


परन्तु मेरे हिसाब से जीने के लिए सपनों का होना सबसे महत्वपूर्ण है|
सपने उन सायों की तरह है जिन्हें हम बेपनाह स्पर्श करने की तमन्ना रखते है|
उन सायों को छूने की कोशिश में बढ़ते बढ़ते काफी आगे निकल जाते है जहाँ से सारे सपने पास दिखने लगते है|
सपनों की छलांग हमें मीलों की दूरी चंद लम्हों में तय कराने की छमता रखती है|


बेवजह सपने देखने में कोई बुराई नहीं, पर उन सपनों को अपने अन्दर दबा देना गलत है| उन आँखों की कद्र करें जो सिर्फ सपनें नहीं देखती पर उन्हें हकीकत की ज़मीन में गढ़ने का हुनर भी सिखाती है|
लोग कहते है सपनें खुली आँखों से देखो, मेरी नजर में सपनें बंद आँखों से ही देखो पर जब उन आँखों को खोलो उन सपनों को पूर्ण करने की कोशिश में जुट जाओ|
सपने उन सफ़ेद पन्नो की तरह है जिस पर स्याही से कुछ भी लिखा जा सकता है, जहाँ ना किसी प्रकार का बंधन और ना ही कोई डर है|


कभी सोचा है, अगर सपने ना होते तो क्या होता?
कोई अख़बार बेचने वाला ऐ.पी.जे अब्दुल कलाम ना होता|
कोई चाय बेचने वाला, हमारे देश का प्रधानमंत्री ना होता|
और कोई पेट्रोल पंपों पे काम करने वाला धीरू भाई अम्बानी ना होता|

सपने हमसे नहीं, हम सपनों से बने है|

Monday, 6 June 2016

एक आसरा

                 


कहते है हर एक नई चीज, एक नई सोच एक नए अनुभव को जन्म देती है| जैसे एक लहर आपको किनारे तक ले जाने की क्षमता रखती है, ठीक वैसे ही एक नया अनुभव आपको उम्दा सोच तक ले जाने की क्षमता रखता है|

जब मैं उन बच्चों से मिलने वाली थी, मेरे भी मन में आप सब की तरह हजार सवाल पनप रहे थे, उसे डर नही कह सकते पर हाँ मन में अजीब ख्यालात, अजीब प्रश्नों का उठना कुछ डर जैसा ही था| पहले मुझे लगा शायद सिर्फ मुझे ही उस हल्के से डर का अनुभव हो रहा है परन्तु जब मैंने अपने साथियों के चेहरे देखे तो बिना कुछ कहे उनके चेहरे के भाव से साफ मालुम चल रहा था कि उनके अन्दर भी सवालों की पोटरी ने डेरा जमाना शुरू कर दिया है| सवाल जैसे वो दिखते कैसे होंगे? उनकी गतिविधियाँ क्या होगी? क्या वो हम सब की तरह ही होंगे या कुछ अलग? क्या हम उनके बीच सुरक्षित महसुस करेंगे? ऐसे अन्गिनत सवालों ने जैसे मन और दिमाग को अपने वश में कर लिया था|

काफी सोचने के बाद जब हम मुख्य द्वार से अन्दर गए तो एक लम्बा रास्ता उन बच्चों की तरफ जा रहा था| जैसे जैसे हम अपने कदम बढ़ा रहे थे वैसे वैसे उन बच्चों से मिलने की अन्तरइच्छा बढती जा रही थी| सेवा कुटिर नामक इस जगह को एक संस्था चलाती है जिसका नाम एस.पी.वाई.एम है| इस संस्था के अन्दर अन्गिनत आश्रय है उनमें से एक सेवा कुटिर भी है जहाँ नशे के लत के कारण जुर्म करने वाले नाबालिक बच्चों को जेल से निकाल कर सुधरने के मौके दिए जाते है या यह कह सकते है कि उन्हें एक आसरा दिया जाता है जहाँ वो अपने बीते हुए काले कल को पीछे छोड़ सुनहरा आज बनाने के लिए अपने कदमों को सही दिशा, सही पथ पर अग्रसर करें|

हम जैसे ही थोड़ा अन्दर गए हमें बताया गया कि बच्चे अपनी कक्षा में बैठे है, हम वहां जाकर उनसे मिल सकते है| धीरे-धीरे हम उनके पास गए और चुपचाप उनके पीछे बैठ गए| कुछ बच्चे हमें देखकर, हमसे मिलकर काफ़ी उत्साहित थे, तो कुछ एक कोने में बैठकर बस हमें दूर से देखे जा रहे थे| हर एक चेहरे की अपनी एक अलग कहानी थी, और ताजुब की बात यह है कि सारे हमें अपनी कहानी सुनाना चाहते थे| वो चाहते थे की हम उनके बारे में जाने, शायद उन अनजान चेहरों को एक नयी पहचान की खोज थी जो कही ना कही उन्हें हमारे द्वारा प्राप्त हो रही थी| उनकी मासुमियत को देखकर ऐसा बिलकुल प्रतीत नही हो रहा था जैसे वो किसी संगीन जूर्म को अंजाम देकर यहाँ आये है| उनसे ढेर सारी बातें कर हमें यह पता चला कि वो जूर्म करना नही चाहते थे, परन्तु नशे की लत ने उन्हें ऐसे काम करने के लिए प्रोत्साहित किया|

कहते है असली हीरे की परख सिर्फ एक जौहरी ही जान सकता है| हम खुद को जौहरी तो नही कह सकते पर वो हीरे  जरुर थे| जब हमने उनसे उनके हुनर के बारे मे पूछा तो उनके जवाबों को सुनकर ऐसा लगा मानो इंसान के अन्दर लाख खूबियाँ हो पर जब तक उन्हें परखने वाला कोई नही मिलता उन खूबियों का कोई मोल नही रह जाता| कोई अच्छा गाता है तो कोई अच्छा लिखता है, कोई नए-नए पकवान बनाना जानता है तो कोई चित्रकला मे अच्छा है| ढेरों हुनर से लदे इन बच्चों को देखकर बस एक ही ख्याल आता है कि काश यह हुनर सही दिशा में प्रयोग किया गया होता तो आज उनकी जिन्दगी एक सही मार्ग पर होती पर कहते है जब इश्वर एक दरवाजा बंद कर देता है तो दूसरा दरवाजा भी स्वयं ही खोल देता है| उन बच्चों का इस संस्था के छाँव मे आना ही एक नए पथ की तरफ इशारा है|
           

                                                                              

Sunday, 21 February 2016

शुक्रिया || (ThankYou)


जब-जब मैं चीखा, वो तेरा दौड़ कर आना याद आया ||

पहला कदम बढ़ाने पर, वो तेरा सँभालने के लिए हाथ बढ़ाना याद आया ||

पढाई ना करने के बहनों के बीच, वो तेरा दिखावटी गुस्सा याद आया ||

स्कूल में होने वाली नोंक-झोंक के बीच, वो तेरा चुपके से मुस्कुराना याद आया ||

आधी रात को डर से उठने पर, वो तेरा पसिने को पोछना याद आया ||

टीचर्स की डांट से बचाने के लिए, वो तेरा बार-बार गलतियाँ छुपाना याद आया ||

मार्क्स कम आने पर, वो तेरा प्यार से समझाना याद आया ||

जब-जब हारने का डर सताया, वो तेरा हौसला बढ़ाना याद आया ||

पहली-पहली मुलाकात पर, वो तेरा प्यार से देखना याद आया ||

कोशिशों से हिम्मत हारने पर, वो तेरा नामुमकिन को मुमकिन करवाना याद आया ||

उम्मीदों के टूटने पर, वो तेरा नए उम्मीदों को जगाना याद आया ||

सबकी नजर तुमपे होने पर, वो तेरा नजर का टिका लगाना याद आया ||

ढेरों जिम्मेदारी आने पर, वो तेरा हिम्मत के साथ हाथों में हाथ देना याद आया ||

थका-हारा घर आने पर, वो तेरा प्यार से गले लगाना याद आया ||

बुढ़ापे में हजारों बिमारियों के बीच, वो तेरा चुपके से मिठाई खिलाना याद आया ||

आँखों से आंसु आने पर, वो तेरा सबपे चिल्लाना याद आया ||

अंतिम साँसों के बीच, वो तेरा फुट-फुट कर रोना याद आया ||

जिसकी तलाश हम सभी को है, सबकी जरुरत, सबकी दवा ||

         वो प्यार का शपर्श याद आया ||

      शुक्रिया हमारी जिन्दगी में आने के लिए ||

        Dedicated to those who love us unconditionally…


  

Sunday, 10 January 2016

JOURNEY...

A little girl with chocolates in her hand jumping here and there. Her little smile is like a drop of water in the ocean of virtuousness. Her bright eyes are like full of deep thoughts. Her tiny feet’s dance like no one is allowed to stop her.

Yes she is pampered, a little stubborn girl. Sometimes she also speaks rude but a soft hearted person whose soul is as sparkling as pearl. Most of the people didn’t like her nature but her mom dad knew that she is a kind person with golden heart. She is not at all talkative but whenever she speaks, it’s like a flow of fresh air with little shyness but more cuteness. A warm touch of her small hands are like a soft feather helps to take out the whole day stress. She is like an open book.

With each passing year, she is growing up and meets so many new people in her life. From the childhood she was being told that each person has their own place in everyone’s life. By learning these things she makes herself sensible to adopt easily in each and every condition. She cries on little things that doesn’t mean she is weak to handle the circumstances but the sign of her innocent nature and soft hearted.

 Her expectations are not so big on the contrary she only expects the little things in her life. She only wants to be special to those who occupy the special place in her life. But she is wrong, everyone has their own thoughts, own rules, own way of looking at their lives as some kind of pilgrimage. Some people will see their role as a pilgrim in terms of setting up a fine status.

She is just emotional not weak. People always tag her as a weak person but now she will not allow anyone to make her realize that she is not strong. Her meeting with so many people in her life teaches her about what is life? Some are like a sweet memory and some are like a true lesson. She has a pure emotion to those who love her unconditionally.

She does believe in ‘true love’, ‘true feeling’ for someone she adores. Her belief is so deep that it gives strength to all to believe in love. For her, falling in love with someone is like the best emotional state, she’s ever going through. No one is perfect, it’s always love to make the person perfect to someone they are meant for.

Her dreams for life are not extraordinary. She believes in simple living. Her wish is only to fulfill her parent’s dream, to give them what they deserve. Her affection and respect for her family is like a sea of love and sentiments. She knows her boundaries and values very well.
        
 I know her. I know her deeply. She is my soulmate. The one thing I know about her is she need love. She is a strong person but at the same time she needs someone to understand her, to respect her and believe in her. Last thing I want to tell her that...

                     Be Strong Girl A Lot More To See…

                                          

      

Tuesday, 5 January 2016

'बेरोजगारी - एक बीमारी'



‘नौजवान’ हमारे देश की नयी पीढ़ी, हमारा भविष्य| आज मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नही होता की हमारे युवा, हमारे देश का भविष्य ‘बेरोजगारी’ जैसे समस्याओं तले दबा हुआ है| यह एक ऐसी समस्या है जिससे आज हर कोई जुझ रहा है|

 अगर बात की जाए हमारे देश के आर्थिक व्यवस्था की तो आज भी भारत के आधे से ज्यादा गावं, कुचे, और शेहरों में गरीबी से ना जाने कितने नौजवानों की जान जा रही है| बेरोजगारी का कीड़ा इस कदर फैला है कि इस देश के कोने-कोने को दूषित करता जा रहा है| भगवान ने हमें दो हाथ, दो पांव, एक मस्तिष्क जैसे अनेक अंगो से नवाजा है, जिसका उपयोग कर हम अपना जीवन यापन कर पाएं| अगर यह सब होने के बावजूद भी हमें अपने जीवन यापन करने मे तकलीफ़ आए या हम इसका सही उपयोग ना कर पाए तो इससे ना की सिर्फ हमारा भविष्य बल्कि हमारे देश का भविष्य भी खतरे मे दिखाई देता है| देश के कोने-कोने से यह ललकार उठ रही है कि ‘बेरोजगारी को खत्म करो’, पर आज भी स्थिति वही बरकरार है और ये कह सकते है की बद से बद्तर होते जा रही है|


सोचने वाली बात यह है कि ऐसे महत्वपूर्ण शिर्षक को लेकर अभी तक सरकार द्वारा कोई ठोस कदम नही उठाया गया है|‘बेरोजगारी’ का सबसे बड़ा कारण हमारे देश की जनसंख्या है| आज पुरे विश्व मे भारत जनसंख्या की दौर मे दूसरे स्थान पर है और यह भी अनुमान लगाया जा चुका है कि २०३० तक भारत ‘चाइना' को पीछे छोड़ पहले स्थान पर उत्रिन हो जायेगा| इस बढती जनसंख्या को देखते हुए भी भारत सरकार ने आज तक कोई पॉलिसी नही लगाई जो बढती जनसंख्या को रोकने में मददगार साबित हो| सरकार, जिस अनुपात में जनसंख्या बढती है, उस अनुपात में नौकरियों का सृजन नहीं कर पाती| नौकरी की कमी की वजह से बेरोजगारी चरम सिमा पर दिखाई दे रही है|

इसका दूसरा कारण शिक्षा व्यवस्था की कमी भी है| आज गाँव-गाँव में विद्यालय की कमी, विद्यालय होते हुए भी शिक्षकों की कमी, या शिक्षक होते हुए भी गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा जैसी कमियों से योग्य युवाओं को भी सही दिशा नही मिल पा रही है, जिससे की बेरोजगारी की समस्या और जटिल होते जा रही है| तीसरा कारण, सरकार की तरफ से रोजगार प्रदान करने की सुस्ती भी मानी जा सकती है| सरकार द्वारा इस महत्वपूर्ण विषय की अनदेखी भी प्रमुख वजह है जिसने हमारे देश के भविष्य को अँधेरे में कर रखा है| किन्तु बेरोजगारी की समस्या के लिए केवल सरकार को ही दोषी नहीं ठहराया जा सकता, भारत में बहुत से ऐसे लोग हैं जो कार्य की प्रतिष्ठा को नहीं समझते हैं और ऐसी नौकरियों की प्रतीक्षा करते रहते हैं जिनमें काम तो कम करना पड़े और प्राप्ति अधिक हो| उनकी सुस्ती और कठिन कार्य में लगने की अनिच्छा उनको बेरोजगार रखती है|

बेरोजगारी की समस्या का शीघ्र-से-शीघ्र हल निकालना होगा| सबसे बड़ी आवयश्कता मानव-शक्ति का नियोजन है जिसकी हमारे देश के युवाओं को सबसे ज्यादा जरुरत है|