‘डर’, आपमें से बहुत से ऐसे लोग होंगे जिन्हें कई सारी चीजों से डर लगता होगा| कुछ लोगों को काफी छोटी-छोटी चीजों से डर लगता है तो कुछ लोगो को काफी बड़ी चीजों से, वास्तव में किसी भी व्यक्ति का डर छोटा या बड़ा नहीं कहा जा सकता क्यूंकि हमें नहीं पता कि किन परिस्थितियों से उनका यह डर जन्मा है|
अक्सर लोग अपने डर को छिपाने के लिए अनेकों हथकंडे आजमाते है, या नए-नए बहाने बनाते है ताकि उस डर से उनका सामना ना हो और वो एक बार फिर से उस डर के साथ लुकाछिपी खेलकर जीत जाए| अगर किसी ने समंदर के लहरों को गौर से देखा हो तो ऐसा लगता है जैसे वो लहरें हमारी तरफ आ रही है, अब हमें बहा कर ले जाएगी, और सब तहस-नहस हो जाएगा परन्तु ऐसा कुछ नहीं होता, लहरें आती है और जाती है और हम वहीं खड़े आनन्द उठाते है| इसी तरह हमारे डर से हमें इतना भय होता है कि हम सोच लेते है अब हमारा कुछ नहीं हो सकता और उसी डर को पूरी जिंदगी अपने साथ लेकर चलते है|
अकेले रह जाने का डर, किसी को दुबारा ना देखने का डर, अपनों से अलग हो जाने का डर, हम कई बार अपने आप को मजबूत बनाते है और फिर से कमजोर पर जाते है| शायद हम डरते है कि लोगों को हमारी कमजोरी का पता ना चल जाए| जैसे-जैसे हम बड़े होते है, जिम्मेदारियाँ बढती जाती है और हमारा समय बटने लगता है| एक समय ऐसा आता है जब हमारे पास खुद के लिए भी वक़्त नहीं होता और क्या पता हम वक़्त निकालना नहीं चाहते कि कहीं फिर उसी डर से हमारी मुलाकात ना हो जाए|


