मत छीनो हमसे हमारा बचपन, मत करो हमपर अत्याचार। हम भी सबकी तरह एक फूल है, फीर क्यों तोड़ते हो हमें बार-बार।
'बचपन' हम सब की जिन्दगी का सबसे हसींन पल, न किसी बात की चिंता और न ही कोई जिम्मेदारी। एक हमारा बचपन था जब माँ हमें तैयार कर स्कूल भेजती थी, जब पापा हमें हाथ पकड़ स्कूल छोड़ने जाते थे। हमें आज भी वह दिन याद होगा जब हमने पढाई का पहला अच्छर सिखा होगा। एक तरफ जहाँ कई बच्चों ने अपने सपने को साकार करने के लिए पहला कदम बढ़ा लिया है, वही कई बच्चे ऐसे है जिन्हे यह तक नही पता कि आखिर वह सपना देखें भी या नही। आज बाल मजदूरी की समस्या से हर कोई अच्छी तरह वाकिफ़ है। हर गली-नुक्कड़ पर कई राजू,मुन्नी,छोटू और चवन्नी मिल जाऐंगे जो हालातों की वज़ह से इस बाल मजदूरी के गिरफ्त में आ चुकें है। आर्थिक तंगी,लाचारी और माता-पिता की प्रताड़ना की वजह से कई बच्चों के सपने सपने रह जाते है, जिन्हे यह तक नही पता की बाकि बच्चों की तरह पढ़ क्यों नहीं सकते? आम बच्चों के बस्तों से भाड़ी अपने सर पर ईटों का बोझ उठाए इन बच्चो की रोज की आमदनी महज़ १०० से २०० रुपए होती है। हमारे देश में न जाने कितने बच्चे होंगे जिन्हे उनके माँ-बाप छोटी उम्र में ही काम पर लगा देते है, ताकि वे उनका पेट पाल सके।कही कूड़े-कचड़े उठाकर, झाड़ू-पोछा लगाकर, झुठी प्लेटें उठाकर तो कही सड़क किनारे जूते पॉलिस कर, सब्जी और फूल बेचकर यह बच्चे कही न कही अपनी मासूमियत को खोते जा रहे है। सरकार के लाख कानूनो और कोशिशों के बाद भी आज इनकी हालातों में कोई सुधार नही आ पाया और तो और इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। गणना के अनुसार बाल मजदूरी में भारत पहले स्थान पर है। इससे आप अंदाजा लगा सकते है की सरकार की कोशिशें कितनी रंग ला रही है।
बच्चों पर हो रहे इस अत्याचार को रोकना ना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए, बल्कि यह हर एक व्यक्ति का संकल्प होना चाहिए।
STOP CHILD LABOUR क्यूंकि यही हमारे भविष्य है।