Saturday, 1 October 2016

मेरी मंजिल

अपनी राहें बनाती हूँ,
अपनी मंजिल ढूँढती हूँ|

ढूँढने को सही रास्ता,
जिन्दगी से चलने का सलिका सीखती हूँ|

ठोकर लगती है पर,
खुद को सँभालती हूँ|

अपने विचारों में वास्तविकता लिए,

अपनी तन्हाइयों को खुद से बाटती हूँ|

 

दुखों के बरसते शोले देखती हूँ,

सुखों की ठंडी बुँदे महसूस करती हूँ|


मर्जी की राह पर काटें भी देखती हूँ,

रूकती हूँ, पर मंजिल याद करती हूँ|

 

काटों के बाद नर्म घास पर चलती हूँ,

दर्द की आड़ में सुखद एहसास ढूँढती हूँ|

 

किसी प्रशंसा की चाह नहीं,

पर खुद का विश्वास जगाती हूँ|

 

हिमालय के समान अडिग होती हूँ,

नदियों की तरह उछलती हूँ|

 

चोटों की परवाह नहीं,

तभी आगे की परवाह करती हूँ|

 

सामने मंजिल पाती हूँ तो मुड़कर,

वो रास्ते देखती हूँ|

 

ठंडी सांसे भरती हूँ,

वापस दिनों को याद करती हूँ|

 

मंजिल मिलती है,

अपना अस्तित्व पाती हूँ|

 

जीवन की सच्चाई देखती हूँ, तो जानती हूँ,

निराधार से उचित आधार है|

 

सब कपोलकल्पित है, चल कर देखती हूँ,

पर जिन्दगी मिली है, फिर से जी उठती हूँ|

 

 

 

 

 

  





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