अपनी राहें बनाती हूँ,
अपनी मंजिल ढूँढती हूँ|
ढूँढने को सही रास्ता,
जिन्दगी से चलने का सलिका सीखती हूँ|
ठोकर लगती है पर,
खुद को सँभालती हूँ|
अपने विचारों में वास्तविकता लिए,
अपनी तन्हाइयों को खुद से बाटती हूँ|
दुखों के बरसते शोले देखती हूँ,
सुखों की ठंडी बुँदे महसूस करती हूँ|
मर्जी की राह पर काटें भी देखती हूँ,
रूकती हूँ, पर मंजिल याद करती हूँ|
काटों के बाद नर्म घास पर चलती हूँ,
दर्द की आड़ में सुखद एहसास ढूँढती
हूँ|
किसी प्रशंसा की चाह नहीं,
पर खुद का विश्वास जगाती हूँ|
हिमालय के समान अडिग होती हूँ,
नदियों की तरह उछलती हूँ|
चोटों की परवाह नहीं,
तभी आगे की परवाह करती हूँ|
सामने मंजिल पाती हूँ तो मुड़कर,
वो रास्ते देखती हूँ|
ठंडी सांसे भरती हूँ,
वापस दिनों को याद करती हूँ|
मंजिल मिलती है,
अपना अस्तित्व पाती हूँ|
जीवन की सच्चाई देखती हूँ, तो जानती हूँ,
निराधार से उचित आधार है|
सब कपोलकल्पित है, चल कर देखती हूँ,
पर जिन्दगी मिली है, फिर से जी उठती हूँ|
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