कभी हँस कर सब कुछ भुला
दिया
तो कभी रो कर सबको हँसा
दिया|
कभी अपने-पन के लिए ही तरसी
तो कभी अपनों से ही भागी|
माना सबकी जिंदगी एक पहेली है
पर फीर क्यों अपनी जिंदगी
से ही हारी|
क्यों बड़ी चीजों में
खुशियाँ ढूंढें कोई
जब छोटे पलों में खुशियाँ
नजर आयी|
अनजान की भीड़ में अपनों की
चाह नहीं
लेकिन ऑंखें अपनों के
लिए ही रोती नज़र आयी|
लाखो लोगों की चाह पूरी
नहीं होती
फिर क्यों मन में वो अभिलाषा
पनप आयी|
उम्मीदों के लिए दिल में
जगह नहीं
लेकिन हर काश में उम्मीद की
वो झलक नजर आयी|
सारी जदोजहेद के बाद जब
शांति ढूँढ़ी
माँ के गोद की वो गर्मी याद
आयी|
फिर कभी जीवन के रास्तो में
कमजोर पड़ी
पापा की वो प्यार भरी डांट समझ
आयी|