Sunday, 26 March 2017

एक सफ़र जीवन की ओर

कभी हँस कर सब कुछ भुला दिया
तो कभी रो कर सबको हँसा दिया|

कभी अपने-पन के लिए ही तरसी
तो कभी अपनों से ही भागी|

माना सबकी जिंदगी एक पहेली है
पर फीर क्यों अपनी जिंदगी से ही हारी|

क्यों बड़ी चीजों में खुशियाँ ढूंढें कोई
जब छोटे पलों में खुशियाँ नजर आयी|

अनजान की भीड़ में अपनों की चाह नहीं
लेकिन ऑंखें अपनों के लिए ही रोती नज़र आयी|

लाखो लोगों की चाह पूरी नहीं होती
फिर क्यों मन में वो अभिलाषा पनप आयी|

उम्मीदों के लिए दिल में जगह नहीं
लेकिन हर काश में उम्मीद की वो झलक नजर आयी|

सारी जदोजहेद के बाद जब शांति ढूँढ़ी
माँ के गोद की वो गर्मी याद आयी|

फिर कभी जीवन के रास्तो में कमजोर पड़ी
पापा की वो प्यार भरी डांट समझ आयी|



Wednesday, 7 December 2016

डर से लड़ो !

‘डर’, आपमें से बहुत से ऐसे लोग होंगे जिन्हें कई सारी चीजों से डर लगता होगा| कुछ लोगों को काफी छोटी-छोटी चीजों से डर लगता है तो कुछ लोगो को काफी बड़ी चीजों से, वास्तव में किसी भी व्यक्ति का डर छोटा या बड़ा नहीं कहा जा सकता क्यूंकि हमें नहीं पता कि किन परिस्थितियों से उनका यह डर जन्मा है|

अक्सर लोग अपने डर को छिपाने के लिए अनेकों हथकंडे आजमाते है, या नए-नए बहाने बनाते है ताकि उस डर से उनका सामना ना हो और वो एक बार फिर से उस डर के साथ लुकाछिपी खेलकर जीत जाए| अगर किसी ने समंदर के लहरों को गौर से देखा हो तो ऐसा लगता है जैसे वो लहरें हमारी तरफ आ रही है, अब हमें बहा कर ले जाएगी, और सब तहस-नहस हो जाएगा परन्तु ऐसा कुछ नहीं होता, लहरें आती है और जाती है और हम वहीं खड़े आनन्द उठाते है| इसी तरह हमारे डर से हमें इतना भय होता है कि हम सोच लेते है अब हमारा कुछ नहीं हो सकता और उसी डर को पूरी जिंदगी अपने साथ लेकर चलते है|

अकेले रह जाने का डर, किसी को दुबारा ना देखने का डर, अपनों से अलग हो जाने का डर, हम कई बार अपने आप को मजबूत बनाते है और फिर से कमजोर पर जाते है| शायद हम डरते है कि लोगों को हमारी कमजोरी का पता ना चल जाए| जैसे-जैसे हम बड़े होते है, जिम्मेदारियाँ बढती जाती है और हमारा समय बटने लगता है| एक समय ऐसा आता है जब हमारे पास खुद के लिए भी वक़्त नहीं होता और क्या पता हम वक़्त निकालना नहीं चाहते कि कहीं फिर उसी डर से हमारी मुलाकात ना हो जाए|

Friday, 11 November 2016

मेरी सोच


इस बदलाव भरी दुनिया में अपनो को पहचानू कैसे, 
हँसते हुए मुखौटों के बीच अकेलेपन को मिटाऊ कैसे? 

बदलाव संसार का नियम है यह कहकर बदल गए जो, 
उन्हें इस बदलाव की पीड़ा का एहसास कराऊ कैसे?
 
उदासी का बोझ लिए जो अकेला आगे बढ़ रहा है, 
अपनी मुस्कुराहट से उसकी हिम्मत बढ़ाऊ कैसे?

मन पर काबू रख अपनों की ख़ुशी के लिए जी रहा जो,
उसे उसकी अच्छाई से मुलाकात कराऊ कैसे?

अपनों को याद कर जब कभी ऑंखें नम हुई, 
उन्ही अपनों को एक बार याद करना सिखाऊ कैसे? 

इस फरेब भड़ी दुनिया में पत्थर का बन गया जो,
उसे उसके दिल की मासूमियत से दोस्ती कराऊँ कैसे?
 
कभी सूर्य के किरणों सा तेज तो कभी चंद्रमा के ठंडक सा नर्म, 
उसे उसकी आदतों का ज्ञात कराऊँ कैसे? 

सबकी उम्मीदों के बीच हँसना भूल गया जो,
उम्मीद अपने ही करते है यह समझाऊ कैसे? 

रास्तों के अँधेरे में भी अडिग रहा जो, 
उसे मंजिल के उजाले से साक्षात्कार कराऊँ कैसे?

सपने देखते देखते जो आँखें सपने बुनना सिख गयी, 
उन्हें हकीकत की ज़मीन पर जगह दिलाऊ कैसे?

Tuesday, 11 October 2016

खूबसूरत कृतियाँ

आज उसी खिड़की से अपनी गली देख रही हूँ जहाँ हमारा बचपन बीता था। जिन गलियों में हम खिलौनों के पीछे दौड़ा करते थे। कल जहाँ बच्चों के चहकने और खेलने की आवाज आती थी वही आज लोगों के भागने और चिलाने की गूंज सुनाई दे रही है।

पहले कुछ समझ नही आया कि आखिर हो क्या रहा है? घर वालों से पूछने पर पता चला हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो रहे हैं। दो ऐसे कौम की लड़ाई जो सदियों से चली आ रही है। जहाँ भाईचारे की गूंज सुनाई देनी चाहिए वहां नफरत के कसिने पढ़े जा रहे थे। जो हाथ एक दूसरे को गले लगाने के लिए उठने चाहिए, वो हाथ एक दूसरे के सर कलम करने को उतारु थे।

देखते ही देखते वो मासूम सी आवाज खौफ भड़े स्वर में तब्दील हो गयी। उसी खिड़की से दूर देखा तो एक ठेले वाला जल्दी में ठेले ले कर भाग रहा था। उसके चेहरे पर डर के भाव तो थे परन्तु एक परेशानी और उदासी भी थी। लोग दंगे कर के भूल जाते है, उन दंगो के कड़वे नतीजों को नजरंदाज कर आगे बढ़ जाते है।

कभी सोचा है इन दंगों में उन लोगों का क्या होता होगा जिनके घर के चूल्हे पुरे दिन की आमदनी पर निर्भर करते है। जिनके बीवी, बच्चे हर शाम का बेसब्री से इंतजार करते है ताकि उनके पिता या पति अपने दिन भर की कमाई से उनके लिए कुछ ले कर आए। इन दंगों का पूरा असर उन गरीबों के रोजमर्रा की जिन्दगी पर पड़ता है।

हम सब खुदा की देन है, उनकी खूबसूरत कृतियाँ है। कृप्या खुदा के इन मनमोहक पन्नों को अनेक धर्मो के खून से लहूलुहान ना करे। बरसों से चली आ रही दुश्मनी के अंधेरे को एक सूरज की किरण प्रदान करें ताकि फिर से किसी गरीब के आँगन में उस खून के छीटें ना जाए और फिर से कोई परिवार भूखा ना सोए।

Sunday, 2 October 2016

संघर्स और सफलता

मै कश्मीर से हूँ, पाकिस्तानी हूँ| रीन्टू सरदार जी के ये कहते ही सब हँसने लगे| सरदार जी का जन्म कश्मीर में हुआ इसलिए उन्हें लोग पाकिस्तानी कहकर चिढ़ाते है| उनकी उम्र लगभग ४५ वर्ष होगी| एस.पी.वाई.एम के मुख्य कार्यालय वसंतकुंज के नशामुक्ति केंद्र में अपना इलाज करवा रहे रीन्टू सिंह से बातें कर के यह समझ आया कि अगर इंसान दृढ़ संकल्प कर ले तो कोई काम मुश्किल नही होता| यह नशामुक्ति केंद्र २० साल के ऊपर के पुरुषों के लिए नियुक्त है जहाँ लोगों को नशामुक्ति के लिए 3 महीन इलाज के लिए रखा जाता है और उन्हें नशामुक्त होने के लिए प्रेरित किया जाता है| सरदार जी भी उनमें से एक है| १९८९ में कश्मीर से दिल्ली आए रीन्टू शालिमार्ग बाघ के केन्द्रीय विद्यालय में आठवी कक्षा में पढ़ते थे| बचपन में गलत दोस्तो के संगत में आने के कारण उन्हें शराब की लत लग गयी| घरवालों ने इसी आदत की वजह से दशवीं कक्षा में फिर से उन्हें कश्मीर बुला लिया| कश्मीर में आसानी से शराब ना उपलब्ध होने के कारण कुछ सालों के लिए उनकी आदतें छुट गई थी| परिवार के दिल्ली में बसने के कारण उन्हें फिर से दिल्ली आना पड़ा| खुद से बड़े उम्र के लोगों से दोस्ती के कारण शराब की लत ने उन्हें इस क़दर जकर लिया कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो इस दलदल से निकल नही पाए| शुरुआत में शराब से अंदरूनी ख़ुशी महसुस करने वाले सरदार जी को शर्म का एहसास तब हुआ जब उन्हें उनके घरवालों ने ही बेवड़ा बुलाना शुरू कर दिया| शादियों या किसी सम्मेलनों में जब अपनी पत्नी और बच्चे के सामने उन्हें इस लत के लिए जलील होना पड़ा तब उन्हें अपनी गलती की समझ आई| कहते है किसी भी शुभ काम के शुरुआत के लिए कभी भी देर नही होती| जब भी अपनी गलती का एहसास हो तभी उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए| कनाडा में रहने वाली उनकी बहन ने उन्हें एस.पी.वाई.एम संस्था के बारे में जानकारी दी| एस.पी.वाई.एम के निर्देशक डाँ राजेश से सम्पर्क करने के बाद उन्हें संस्था के नशामुक्ति केंद्र के बारे मे पता चला| २०१४ में इस संस्था से जुड़ने के बाद सरदार जी को अपने अन्दर बहुत से परिवर्तन का एहसास हुआ| एक घंटे के ध्यान की कक्षा से लोगों को अपने अंतरात्मा में झाकने का मौका दिया जाता है| ‘जस्ट फॉर टुडे’ नामक कक्षा में सभी को अपने-अपने अनुभवों को बांटने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है| इस कक्षा में आने की अनुमति किसी भी बाहर वाले को नही दी जाती ताकि वहाँ के लोग अपने अनुभवों को बताने में असुविधाजनक परिस्थितियाँ ना महसुस करें| २०१४ में 3 महीने के इलाज के बाद सरदार जी ने ऑटो रिक्शा चलाना शुरू कर दिया| आर्थिक तंगी और नाकामयाबी की वजह से शराब के गंदे लत ने फिर से उन्हें वश मे कर लिया| जैसे-जैसे समय बीतता गया स्थिति बद से बत्तर होने लगी| हाल ये हो गया कि यदि एक दिन भी नशा करने को ना मिले तो उनके हाथ पांव कांपने लग जाते थे| जिनके दिन की शुरुआत ही नशे से हो उनकी जिंदगी का अंदाजा कोई भी लगा सकता है| निरश्ता से भरी ऐसी जिन्दगी को यदि कोई व्यक्ति जीने का नाम दे तो इससे मुर्खता वाली बात हो ही नही सकती| आज अपने आप को मुर्ख कहने वाले सरदार जी मेरी नजर में एक बहुत ही मजबूत इरादे वाले व्यक्ति है जिन्होंने एक महीने पहले दुबारा एस.पी.वाई.एम में आने का सामर्थ्य दिखाया| जब मैंने उनसे पूछा वो किसके लिए बदलना चाहते है? तुरन्त ही मुझे जवाब मिला अपने पत्नी और बच्चों के लिए| अंत में उन्होंने बस एक   बात कही ‘यदि ढेरों कोशिशो के बाद भी आपको खुद में कोई सुधार ना दिखे तो खुद के लिए नही जो आपसे प्यार करते है उनके लिए बदलो, अपने आप हिम्मत मिलेगी| रीन्टू सिंह जैसे बहुत से ऐसे लोग वहां मौजूद है, जिन्हें एस.पी.वाई.एम संस्था द्वारा सुखद जीवन व्यतीत करने की एक नयी उम्मीद मिली है|  

Saturday, 1 October 2016

मेरी मंजिल

अपनी राहें बनाती हूँ,
अपनी मंजिल ढूँढती हूँ|

ढूँढने को सही रास्ता,
जिन्दगी से चलने का सलिका सीखती हूँ|

ठोकर लगती है पर,
खुद को सँभालती हूँ|

अपने विचारों में वास्तविकता लिए,

अपनी तन्हाइयों को खुद से बाटती हूँ|

 

दुखों के बरसते शोले देखती हूँ,

सुखों की ठंडी बुँदे महसूस करती हूँ|


मर्जी की राह पर काटें भी देखती हूँ,

रूकती हूँ, पर मंजिल याद करती हूँ|

 

काटों के बाद नर्म घास पर चलती हूँ,

दर्द की आड़ में सुखद एहसास ढूँढती हूँ|

 

किसी प्रशंसा की चाह नहीं,

पर खुद का विश्वास जगाती हूँ|

 

हिमालय के समान अडिग होती हूँ,

नदियों की तरह उछलती हूँ|

 

चोटों की परवाह नहीं,

तभी आगे की परवाह करती हूँ|

 

सामने मंजिल पाती हूँ तो मुड़कर,

वो रास्ते देखती हूँ|

 

ठंडी सांसे भरती हूँ,

वापस दिनों को याद करती हूँ|

 

मंजिल मिलती है,

अपना अस्तित्व पाती हूँ|

 

जीवन की सच्चाई देखती हूँ, तो जानती हूँ,

निराधार से उचित आधार है|

 

सब कपोलकल्पित है, चल कर देखती हूँ,

पर जिन्दगी मिली है, फिर से जी उठती हूँ|

 

 

 

 

 

  





Saturday, 17 September 2016

फूल और हम

आज भी जब उन फूलों को गिरा देखती हूँ, 
एक अपनापन सा लगता है|
कभी ये फूल भी खिलते होंगे,
अपनी खुशबू से सबको मंत्रमुग्ध करते होंगे|


कभी किसी के चेहरे की मुस्कान बनकर,
तो कभी किसी के बालों की खूबसूरती|
कभी किसी की दोस्ती की शुरुआत बनकर,
तो कभी किसी के प्यार की मंजिल|
कभी किसी के घर की शोभा बनकर,
तो कभी किसी के शव की श्रद्धांजलि|


इस तेज दौड़ती दुनिया में ना जाने कितने पैरों ने इन्हें कुचला,
ना जाने कितनी बार हमें दर्द भरी आह से पुकारा|
उस दर्द को अनसुना कर जब हम आगे बढ़ते गए,
फिर भी हमारी अंतिम सांस तक हमें सजाया|


आज भी जब उन फूलों को मुरझाए देखती हूँ,
एक अपनापन सा लगता है|
कभी ये फूल भी चेहकते होंगे,
साथी तितलिओं संग खेलते होंगे|


कुछ लोग भी इन्ही फूलों के सामान है|
जो दूर रह कर भी अपनी सादगी से सबका दिल छु जाए,
जो अपने रंगों से इन्द्रधनुष बना जाए|
कद्र करे उन लोगों की जो आस पास ना होकर भी,
आपका साथ निभा जाए|