Thursday, 10 December 2015

kho gya hai bachpan kahien


क्या होता है ‘बचपन’?

                   
   

कोई यह सवाल पूछे तो चेहरे पर एक अलग सी शांति और मुस्कान आ जाती है| हम सब की जिंदगी का सबसे यादगार लम्हा जिसका स्मरण करते ही सारी थकावट, सारी परेशानी दूर हो जाती है| बचपन की यादों को संजोग कर हर कोई इस तरह रखता है कि कहीं सारी यादें धुंधली ना पड़ जाए|

वो माँ के हाथों से खाना खाते-खाते भाग जाना, और फिर माँ का अलग-अलग पक्षिओं और जानवरों के नाम लेकर वो रोटी के कौर खिलाना, वो पापा के काम से लौटने पर उनकी जेब टटोलना कि आज कौन सी चौकलेट आई है? वो टीवी देखते-देखते सोफे पे सो जाना और सुबह उठना तो अपने आप को बिस्तर पर पाना| वो दोस्तों के साथ खेलना, पल भर में रूठना और पल भर में मान जाना, नए-नए खेल खेलना, हँसना, खिलखिलाना, बिना किसी बात की चिंता किए मद-मस्त अंदाज में खुशियों को नई उड़ान देना| वो स्कूल का पहला दिन नए यूनिफार्म, नए जूते, नया बस्ता, नए दोस्त, नए शिक्षक| हर कोई नया फिर भी सब कुछ कितना अच्छा लगता था|

हमारा परिवेश एक नई दुनियाँ में होने जा रहा था जैसे मछली को पानी मे आकर जीने की नई किरण, नया वजूद मिलता है वैसे ही हमें एक अलग पहचान मिलने वाली थी| बचपन की इतनी सारी यादें है कि उसे शब्दों मे पिरोहना काफी मुस्किल है|

देखते ही देखते हम बड़े हो गए| ना वो मासुमियत रही ना वो भोलापन; सब कुछ बदल गया उस मासुमियत के धूप को छल-कपट के छाव ने इस कदर घेर लिया कि उसका नामों-निशान मिट गया|

 आज जब सुबह आँख खोलती हूँ तो अपने आप को अकेला पाती हूँ आज ना वो माँ है जो चीख-चीख कर चादर हटाती थी और ना वो पापा है जो माँ के मुझपर चीखने पर उन्हें डांट लगाते थे| आज जब खिड़की से बाहर कड़ी धुप में छोटे-छोटे बच्चों को खेलते देखती हूँ तो ऐसा लगता है मानों यह कड़ी धूप भी इन्हें मीठी छाओं का सुख दे रही हो| बचपन मे जो नजर हर किसी को अपना समझती थी आज वही नजर अपना और पराया देखती है, अपने अपने रहें नही और परायों से अपनेपन की उम्मीद नही|

आज जब भी अपने आप को बेबस और लाचार पाती हूँ तो माँ को याद करती हूँ की अज वो इस जगह पर होती तो क्या करती??

            हाँ, खो गया है बचपन कहीं..         

Friday, 2 October 2015

Treat Transgenders as you treat yourself !


आज हम जानेंगे एक ऐसे समुदाय के लोंगो को जिन्हें इस समाज ने अपनाने से इन्कार कर दिया, जो आज भी अपने वजुद को तलासते नजर आते है। हम बात कर रहे है 'किन्नर' समुदाय की, 'किन्नर' शब्द आते ही दिमाग में कौंध जाती है एक ऐसी तस्वीर, जिसे ना हम पुरी तरह से मर्द कह सकते है और ना औरत। जिन्हें लोग बरातियों में, और ख़ुशी के मौके पे गाते, बजाते और दुआऐं देते देखते है, आम तौर पर लोग किन्नरों से इसी रूप में परिचीत है। एक आम आदमी की जिन्दगी जहाँ रोज एक नई सुबह, एक नई किरण लेकर आती है, वहीं इनकी जिन्दगी में सिर्फ अँधेरा ही लिखा है। नर-नारी के अलावा एक तिसरी नश्ल, जिन्हें भगवान ने एक अलग शरीर देकर पैदा किया है। यह एक ऐसा अभिशप्त समुदाय है, जिनका कोई धर्म नहीं, ये ना हिन्दू है,  ना मुस्लमान, ना सिख, ना ईसाई। इनकी एक अलग ही दुनिया है, जहाँ ये लोग बिना किसी धर्म को माने स्वतंत्रता से रहते है। आज इस समाज ने इन्हें इतना विवश कर दिया है कि इन लोगों के पास चिख-चिख कर गुहार लगाने के शिवा और रास्ता नही है कि "हम भी इंसान है।" २०११ में भले ही इन्हे मतदान देने का अधिकार सरकार ने दिया हो पर इससे इनकी हालत में कोई सुधार नही आ पाया। 'किन्नर' ईश्वर की देन है, जिन्हे इस समाज में कोई दर्जा नही दिया गया है। किन्नरों की आमदनी का एक मात्र ज़रिया, आम आदमी के घरो में शादी और बच्चे के आगमन से होती है। लोगों को खुश करना और उनकी ख़ुशी की कामना करना, यही इनके जीवन व्यतीत करने का साधन बन गया है। ऊपर से मदमस्त अंदाज में नाचते-गाते इन किन्नरों को देख कर कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि ना जाने कितने दर्द और तकलीफों को इन लोंगो ने अपने अंदर दबा कर रखा है। 

                                      
  हम तुम जैसे नहीं, 
  हमारा कोई वजुद नहीं। 
  फिर भी यह कहना आज सही लगता है, 
  हाँ, हम भी इंसान है,
  हाँ , हम भी इंसान है। 

क्यों नहीं करते तुम हमारी कद्र,
क्यों हमें रहता है सबका डर।
आज चीख-चीख कर यह पूछना सही लगता है,
क्या हम नहीं इंसान है?
क्या हम नहीं इंसान है?

   
     

Friday, 25 September 2015

voice against child labour

                                                       

                                                       मत छीनो हमसे हमारा बचपन,                                                         मत करो हमपर अत्याचार।                                                           हम भी सबकी तरह एक फूल है,                                                        फीर क्यों तोड़ते हो हमें बार-बार। 


 'बचपन' हम सब की  जिन्दगी का सबसे हसींन पल, न किसी बात की चिंता और  न ही कोई जिम्मेदारी। एक हमारा बचपन था जब माँ हमें तैयार कर स्कूल भेजती थी, जब पापा हमें हाथ पकड़ स्कूल छोड़ने जाते थे। हमें आज भी वह दिन याद होगा जब हमने पढाई का पहला अच्छर सिखा होगा। एक तरफ जहाँ कई बच्चों ने अपने सपने को साकार करने के लिए पहला कदम बढ़ा लिया है, वही कई बच्चे ऐसे है जिन्हे यह तक नही पता कि आखिर वह सपना देखें भी या नही। आज बाल मजदूरी की समस्या से हर कोई अच्छी तरह वाकिफ़ है। हर गली-नुक्कड़ पर कई राजू,मुन्नी,छोटू और चवन्नी मिल जाऐंगे जो हालातों की वज़ह से इस बाल मजदूरी के गिरफ्त में आ चुकें है। आर्थिक तंगी,लाचारी और माता-पिता की प्रताड़ना की वजह से कई बच्चों के सपने सपने रह जाते है, जिन्हे यह तक नही पता की बाकि बच्चों की तरह पढ़ क्यों नहीं सकते? आम बच्चों के बस्तों से भाड़ी अपने सर पर ईटों का बोझ उठाए इन बच्चो की रोज की आमदनी महज़ १०० से २०० रुपए होती है। हमारे देश में न जाने कितने बच्चे होंगे जिन्हे उनके माँ-बाप छोटी उम्र में ही काम पर लगा देते है, ताकि वे उनका पेट पाल सके।कही कूड़े-कचड़े उठाकर, झाड़ू-पोछा लगाकर, झुठी प्लेटें उठाकर तो कही सड़क किनारे जूते पॉलिस कर, सब्जी और फूल बेचकर यह बच्चे कही न कही अपनी मासूमियत को खोते जा रहे है। सरकार के लाख कानूनो और कोशिशों के बाद भी आज इनकी हालातों में कोई सुधार  नही आ पाया और तो और इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। गणना के अनुसार बाल मजदूरी में भारत पहले स्थान पर है। इससे आप अंदाजा लगा सकते है की सरकार की कोशिशें कितनी रंग ला रही है।

 बच्चों पर हो रहे इस अत्याचार को रोकना ना सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए, बल्कि यह हर एक व्यक्ति का संकल्प होना चाहिए।     

                                       STOP CHILD LABOUR क्यूंकि यही हमारे भविष्य है।      

Saturday, 19 September 2015

No colour discrimination

                                     " काली - कलुठि "

'काली-कलुठि ' इस शब्द से हर कोई परिचित होगा, भारत के लगभग हर घर, हर गली, में अक्सर कोई न कोई 
आपको इस शब्द का प्रयोग करते दिख जाएगा। किसी ने मजाक में कह दिया तो किसी ने व्यंग करते हुए पर इस्तेमाल करेंगे जरूर। आंकड़ों के अनुसार भारत पूरी दुनिया में पहले स्थान पर है जहाँ इस तरह के भेद-भाव होते है। अक्सर लोग यह भूल जाते है कि रंग ईश्वर की देन है, और हमारा कोई हक़ नही बनता की हम ईश्वर की कारीगरी की अवहेलना करें। काले लोगों को अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, खास कर निचली वर्गीये लोगों में हमेशा यह सोच रहती है कि काले लोगों को अपनी पहचान बनाने में बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लोगों का यह मानना है कि जहां गोर लोगो को हर क्षेत्र में आसानी से सफ़लता मिल  
जाती है, वहीं काले रंग के लोगों को काफी संघर्स करना पड़ता है। तू तो काली है। तुझसे कौन शादी करेगा ? तुझे
तो अच्छी नौकरी भी नहीं मिलेगी। यह सारी बातें नियमित रूप से काली लड़कियों के कान में भड़ी जाती है। यह तक कि काफी क्रीम विज्ञापनों में भी यही दिखाया जाता है कि कैसे काले रंग से गोरे होकर लड़कियाँ अपनी  मंजिल को पाती है। हर एक पत्रिका के लगभग आधे से ज्यादा पन्नों पर यही विज्ञापन होता है कि कैसे आप गोरी त्वचा पा सकते है। लोगों के अंदर यह भावना बैठ गयी है कि 'कला रंग होना एक अभिशाप है' लेकिन न जाने ऐसे कितने उदहारण है जिन्होंने अपने बल-बुत्ते से समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। हमारे फिल्म जगत में भी ऐसे कई उदहारण है जैसे काजोल, अजय देवगन, प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, नंदिता दास और ना जाने कितने, जो रंग से सांवले होने के बावजूद आज अपने क्षेत्र में शिर्ष पर है। हमारे देश के उप-राष्ट्रपति और मिशाइल मैन 'डॉ ए.पी.जे अब्दुल कलाम आज़ाद' भी रंग से सांवले थे, पर उन्होंने अपने प्रतिभा के दम पर आज न कि सिर्फ भारतियों के दिलों में बल्कि पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। ऐसे कई उदाहरण है जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि रंग से इंसान की प्रतिभा कम नही होती और न ही उस प्रतिभा की कीमत कम होती है। कल भी प्रतिभा की पूजा होती थी, आज भी होती है और हमेशा होती रहेगी। 

         "बदलाव किसी के रंग में नहीं अपनी सोच में लाऐं, क्यूंकि खूबसूरती की कोई परिभाषा नहीं होती" 

                                                 we have to break the stereotype.

                              "say no to colour discrimination"