Friday, 2 October 2015

Treat Transgenders as you treat yourself !


आज हम जानेंगे एक ऐसे समुदाय के लोंगो को जिन्हें इस समाज ने अपनाने से इन्कार कर दिया, जो आज भी अपने वजुद को तलासते नजर आते है। हम बात कर रहे है 'किन्नर' समुदाय की, 'किन्नर' शब्द आते ही दिमाग में कौंध जाती है एक ऐसी तस्वीर, जिसे ना हम पुरी तरह से मर्द कह सकते है और ना औरत। जिन्हें लोग बरातियों में, और ख़ुशी के मौके पे गाते, बजाते और दुआऐं देते देखते है, आम तौर पर लोग किन्नरों से इसी रूप में परिचीत है। एक आम आदमी की जिन्दगी जहाँ रोज एक नई सुबह, एक नई किरण लेकर आती है, वहीं इनकी जिन्दगी में सिर्फ अँधेरा ही लिखा है। नर-नारी के अलावा एक तिसरी नश्ल, जिन्हें भगवान ने एक अलग शरीर देकर पैदा किया है। यह एक ऐसा अभिशप्त समुदाय है, जिनका कोई धर्म नहीं, ये ना हिन्दू है,  ना मुस्लमान, ना सिख, ना ईसाई। इनकी एक अलग ही दुनिया है, जहाँ ये लोग बिना किसी धर्म को माने स्वतंत्रता से रहते है। आज इस समाज ने इन्हें इतना विवश कर दिया है कि इन लोगों के पास चिख-चिख कर गुहार लगाने के शिवा और रास्ता नही है कि "हम भी इंसान है।" २०११ में भले ही इन्हे मतदान देने का अधिकार सरकार ने दिया हो पर इससे इनकी हालत में कोई सुधार नही आ पाया। 'किन्नर' ईश्वर की देन है, जिन्हे इस समाज में कोई दर्जा नही दिया गया है। किन्नरों की आमदनी का एक मात्र ज़रिया, आम आदमी के घरो में शादी और बच्चे के आगमन से होती है। लोगों को खुश करना और उनकी ख़ुशी की कामना करना, यही इनके जीवन व्यतीत करने का साधन बन गया है। ऊपर से मदमस्त अंदाज में नाचते-गाते इन किन्नरों को देख कर कोई यह अंदाजा नहीं लगा सकता कि ना जाने कितने दर्द और तकलीफों को इन लोंगो ने अपने अंदर दबा कर रखा है। 

                                      
  हम तुम जैसे नहीं, 
  हमारा कोई वजुद नहीं। 
  फिर भी यह कहना आज सही लगता है, 
  हाँ, हम भी इंसान है,
  हाँ , हम भी इंसान है। 

क्यों नहीं करते तुम हमारी कद्र,
क्यों हमें रहता है सबका डर।
आज चीख-चीख कर यह पूछना सही लगता है,
क्या हम नहीं इंसान है?
क्या हम नहीं इंसान है?