मै कश्मीर से हूँ, पाकिस्तानी हूँ| रीन्टू
सरदार जी के ये कहते ही सब हँसने लगे| सरदार जी का जन्म कश्मीर
में हुआ इसलिए उन्हें लोग पाकिस्तानी कहकर चिढ़ाते है| उनकी उम्र लगभग ४५ वर्ष
होगी| एस.पी.वाई.एम के मुख्य कार्यालय वसंतकुंज के नशामुक्ति केंद्र
में अपना इलाज करवा रहे रीन्टू सिंह से बातें कर के यह समझ आया कि अगर इंसान दृढ़
संकल्प कर ले तो कोई काम मुश्किल नही होता| यह नशामुक्ति केंद्र २० साल के ऊपर के पुरुषों के लिए नियुक्त है
जहाँ लोगों को नशामुक्ति के लिए 3 महीन इलाज के लिए रखा जाता है और उन्हें
नशामुक्त होने के लिए प्रेरित किया जाता है| सरदार जी भी उनमें से एक है| १९८९ में
कश्मीर से दिल्ली आए रीन्टू शालिमार्ग बाघ के केन्द्रीय विद्यालय में आठवी कक्षा
में पढ़ते थे| बचपन में गलत दोस्तो के संगत में आने के कारण उन्हें शराब की लत लग
गयी| घरवालों ने इसी आदत की वजह से दशवीं कक्षा में फिर से उन्हें कश्मीर बुला
लिया| कश्मीर में आसानी से शराब ना उपलब्ध होने के कारण कुछ सालों के लिए उनकी
आदतें छुट गई थी| परिवार के दिल्ली में बसने के कारण उन्हें फिर से दिल्ली आना
पड़ा| खुद से बड़े उम्र के लोगों से दोस्ती के कारण शराब की लत ने उन्हें इस क़दर जकर
लिया कि लाख कोशिश करने के बावजूद भी वो इस दलदल से निकल नही पाए| शुरुआत में शराब
से अंदरूनी ख़ुशी महसुस करने वाले सरदार जी को शर्म का एहसास तब हुआ जब उन्हें उनके
घरवालों ने ही बेवड़ा बुलाना शुरू कर दिया| शादियों या किसी सम्मेलनों में जब अपनी
पत्नी और बच्चे के सामने उन्हें इस लत के लिए जलील होना पड़ा तब उन्हें अपनी गलती
की समझ आई| कहते है किसी भी शुभ काम के शुरुआत के लिए कभी भी देर नही होती| जब भी
अपनी गलती का एहसास हो तभी उसे सुधारने में जुट जाना चाहिए| कनाडा में रहने वाली
उनकी बहन ने उन्हें एस.पी.वाई.एम संस्था के बारे में जानकारी दी| एस.पी.वाई.एम के निर्देशक डाँ राजेश से सम्पर्क करने
के बाद उन्हें संस्था के नशामुक्ति केंद्र के बारे मे पता चला| २०१४ में इस संस्था
से जुड़ने के बाद सरदार जी को अपने अन्दर बहुत से परिवर्तन का एहसास हुआ| एक घंटे के ध्यान की कक्षा से लोगों को अपने
अंतरात्मा में झाकने का मौका दिया जाता है| ‘जस्ट फॉर टुडे’ नामक कक्षा में सभी को
अपने-अपने अनुभवों को बांटने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है| इस कक्षा में आने
की अनुमति किसी भी बाहर वाले को नही दी जाती ताकि वहाँ के लोग अपने अनुभवों को
बताने में असुविधाजनक परिस्थितियाँ ना महसुस करें| २०१४ में 3 महीने के इलाज के बाद सरदार जी ने ऑटो
रिक्शा चलाना शुरू कर दिया| आर्थिक तंगी और नाकामयाबी
की वजह से शराब के गंदे लत ने फिर से उन्हें वश मे कर लिया| जैसे-जैसे समय बीतता
गया स्थिति बद से बत्तर होने लगी| हाल ये हो गया कि यदि एक दिन भी नशा करने को ना
मिले तो उनके हाथ पांव कांपने लग जाते थे| जिनके दिन की शुरुआत ही नशे से हो उनकी
जिंदगी का अंदाजा कोई भी लगा सकता है| निरश्ता से भरी ऐसी जिन्दगी को यदि कोई व्यक्ति
जीने का नाम दे तो इससे मुर्खता वाली बात हो ही नही सकती| आज अपने आप को मुर्ख
कहने वाले सरदार जी मेरी नजर में एक बहुत ही मजबूत इरादे वाले व्यक्ति है
जिन्होंने एक महीने पहले दुबारा एस.पी.वाई.एम में आने का सामर्थ्य दिखाया| जब
मैंने उनसे पूछा वो किसके लिए बदलना चाहते है? तुरन्त ही मुझे जवाब मिला अपने
पत्नी और बच्चों के लिए| अंत में उन्होंने बस एक
बात कही ‘यदि ढेरों कोशिशो के बाद
भी आपको खुद में कोई सुधार ना दिखे तो खुद के लिए नही जो आपसे प्यार करते है उनके
लिए बदलो, अपने आप हिम्मत मिलेगी| रीन्टू सिंह जैसे बहुत से ऐसे लोग वहां मौजूद
है, जिन्हें एस.पी.वाई.एम संस्था द्वारा सुखद जीवन व्यतीत करने की एक नयी उम्मीद
मिली है|
No comments:
Post a Comment