इस बदलाव भरी दुनिया में अपनो को पहचानू कैसे,
हँसते हुए मुखौटों के बीच अकेलेपन को मिटाऊ कैसे?
बदलाव संसार का नियम है यह कहकर बदल गए जो,
उन्हें इस बदलाव की पीड़ा का एहसास कराऊ कैसे?
उदासी का बोझ लिए जो अकेला आगे बढ़ रहा है,
अपनी मुस्कुराहट से उसकी हिम्मत बढ़ाऊ कैसे?
मन पर काबू रख अपनों की ख़ुशी के लिए जी रहा जो,
उसे उसकी अच्छाई से मुलाकात कराऊ कैसे?
अपनों को याद कर जब कभी ऑंखें नम हुई,
उन्ही अपनों को एक बार याद करना सिखाऊ कैसे?
इस फरेब भड़ी दुनिया में पत्थर का बन गया जो,
उसे उसके दिल की मासूमियत से दोस्ती कराऊँ कैसे?
कभी सूर्य के किरणों सा तेज तो कभी चंद्रमा के ठंडक सा नर्म,
उसे उसकी आदतों का ज्ञात कराऊँ कैसे?
सबकी उम्मीदों के बीच हँसना भूल गया जो,
उम्मीद अपने ही करते है यह समझाऊ कैसे?
रास्तों के अँधेरे में भी अडिग रहा जो,
उसे मंजिल के उजाले से साक्षात्कार कराऊँ कैसे?
सपने देखते देखते जो आँखें सपने बुनना सिख गयी,
उन्हें हकीकत की ज़मीन पर जगह दिलाऊ कैसे?