आज भी जब उन फूलों को गिरा देखती हूँ,
एक अपनापन सा लगता है|
कभी ये फूल भी खिलते होंगे,
अपनी खुशबू से सबको मंत्रमुग्ध करते होंगे|
कभी किसी के चेहरे की मुस्कान बनकर,
तो कभी किसी के बालों की खूबसूरती|
कभी किसी की दोस्ती की शुरुआत बनकर,
तो कभी किसी के प्यार की मंजिल|
कभी किसी के घर की शोभा बनकर,
तो कभी किसी के शव की श्रद्धांजलि|
इस तेज दौड़ती दुनिया में ना जाने कितने पैरों ने इन्हें कुचला,
ना जाने कितनी बार हमें दर्द भरी आह से पुकारा|
उस दर्द को अनसुना कर जब हम आगे बढ़ते गए,
फिर भी हमारी अंतिम सांस तक हमें सजाया|
आज भी जब उन फूलों को मुरझाए देखती हूँ,
एक अपनापन सा लगता है|
कभी ये फूल भी चेहकते होंगे,
साथी तितलिओं संग खेलते होंगे|
कुछ लोग भी इन्ही फूलों के सामान है|
जो दूर रह कर भी अपनी सादगी से सबका दिल छु जाए,
जो अपने रंगों से इन्द्रधनुष बना जाए|
कद्र करे उन लोगों की जो आस पास ना होकर भी,
आपका साथ निभा जाए|