आज उसी खिड़की से अपनी गली देख रही हूँ जहाँ हमारा बचपन बीता था। जिन गलियों में हम खिलौनों के पीछे दौड़ा करते थे। कल जहाँ बच्चों के चहकने और खेलने की आवाज आती थी वही आज लोगों के भागने और चिलाने की गूंज सुनाई दे रही है।
पहले कुछ समझ नही आया कि आखिर हो क्या रहा है? घर वालों से पूछने पर पता चला हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो रहे हैं। दो ऐसे कौम की लड़ाई जो सदियों से चली आ रही है। जहाँ भाईचारे की गूंज सुनाई देनी चाहिए वहां नफरत के कसिने पढ़े जा रहे थे। जो हाथ एक दूसरे को गले लगाने के लिए उठने चाहिए, वो हाथ एक दूसरे के सर कलम करने को उतारु थे।
देखते ही देखते वो मासूम सी आवाज खौफ भड़े स्वर में तब्दील हो गयी। उसी खिड़की से दूर देखा तो एक ठेले वाला जल्दी में ठेले ले कर भाग रहा था। उसके चेहरे पर डर के भाव तो थे परन्तु एक परेशानी और उदासी भी थी। लोग दंगे कर के भूल जाते है, उन दंगो के कड़वे नतीजों को नजरंदाज कर आगे बढ़ जाते है।
कभी सोचा है इन दंगों में उन लोगों का क्या होता होगा जिनके घर के चूल्हे पुरे दिन की आमदनी पर निर्भर करते है। जिनके बीवी, बच्चे हर शाम का बेसब्री से इंतजार करते है ताकि उनके पिता या पति अपने दिन भर की कमाई से उनके लिए कुछ ले कर आए। इन दंगों का पूरा असर उन गरीबों के रोजमर्रा की जिन्दगी पर पड़ता है।
हम सब खुदा की देन है, उनकी खूबसूरत कृतियाँ है। कृप्या खुदा के इन मनमोहक पन्नों को अनेक धर्मो के खून से लहूलुहान ना करे। बरसों से चली आ रही दुश्मनी के अंधेरे को एक सूरज की किरण प्रदान करें ताकि फिर से किसी गरीब के आँगन में उस खून के छीटें ना जाए और फिर से कोई परिवार भूखा ना सोए।