Sunday, 26 March 2017

एक सफ़र जीवन की ओर

कभी हँस कर सब कुछ भुला दिया
तो कभी रो कर सबको हँसा दिया|

कभी अपने-पन के लिए ही तरसी
तो कभी अपनों से ही भागी|

माना सबकी जिंदगी एक पहेली है
पर फीर क्यों अपनी जिंदगी से ही हारी|

क्यों बड़ी चीजों में खुशियाँ ढूंढें कोई
जब छोटे पलों में खुशियाँ नजर आयी|

अनजान की भीड़ में अपनों की चाह नहीं
लेकिन ऑंखें अपनों के लिए ही रोती नज़र आयी|

लाखो लोगों की चाह पूरी नहीं होती
फिर क्यों मन में वो अभिलाषा पनप आयी|

उम्मीदों के लिए दिल में जगह नहीं
लेकिन हर काश में उम्मीद की वो झलक नजर आयी|

सारी जदोजहेद के बाद जब शांति ढूँढ़ी
माँ के गोद की वो गर्मी याद आयी|

फिर कभी जीवन के रास्तो में कमजोर पड़ी
पापा की वो प्यार भरी डांट समझ आयी|



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