" काली - कलुठि "
'काली-कलुठि ' इस शब्द से हर कोई परिचित होगा, भारत के लगभग हर घर, हर गली, में अक्सर कोई न कोई
आपको इस शब्द का प्रयोग करते दिख जाएगा। किसी ने मजाक में कह दिया तो किसी ने व्यंग करते हुए पर इस्तेमाल करेंगे जरूर। आंकड़ों के अनुसार भारत पूरी दुनिया में पहले स्थान पर है जहाँ इस तरह के भेद-भाव होते है। अक्सर लोग यह भूल जाते है कि रंग ईश्वर की देन है, और हमारा कोई हक़ नही बनता की हम ईश्वर की कारीगरी की अवहेलना करें। काले लोगों को अक्सर आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है, खास कर निचली वर्गीये लोगों में हमेशा यह सोच रहती है कि काले लोगों को अपनी पहचान बनाने में बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। लोगों का यह मानना है कि जहां गोर लोगो को हर क्षेत्र में आसानी से सफ़लता मिल
जाती है, वहीं काले रंग के लोगों को काफी संघर्स करना पड़ता है। तू तो काली है। तुझसे कौन शादी करेगा ? तुझे
तो अच्छी नौकरी भी नहीं मिलेगी। यह सारी बातें नियमित रूप से काली लड़कियों के कान में भड़ी जाती है। यह तक कि काफी क्रीम विज्ञापनों में भी यही दिखाया जाता है कि कैसे काले रंग से गोरे होकर लड़कियाँ अपनी मंजिल को पाती है। हर एक पत्रिका के लगभग आधे से ज्यादा पन्नों पर यही विज्ञापन होता है कि कैसे आप गोरी त्वचा पा सकते है। लोगों के अंदर यह भावना बैठ गयी है कि 'कला रंग होना एक अभिशाप है' लेकिन न जाने ऐसे कितने उदहारण है जिन्होंने अपने बल-बुत्ते से समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई है। हमारे फिल्म जगत में भी ऐसे कई उदहारण है जैसे काजोल, अजय देवगन, प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण, नंदिता दास और ना जाने कितने, जो रंग से सांवले होने के बावजूद आज अपने क्षेत्र में शिर्ष पर है। हमारे देश के उप-राष्ट्रपति और मिशाइल मैन 'डॉ ए.पी.जे अब्दुल कलाम आज़ाद' भी रंग से सांवले थे, पर उन्होंने अपने प्रतिभा के दम पर आज न कि सिर्फ भारतियों के दिलों में बल्कि पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। ऐसे कई उदाहरण है जिन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि रंग से इंसान की प्रतिभा कम नही होती और न ही उस प्रतिभा की कीमत कम होती है। कल भी प्रतिभा की पूजा होती थी, आज भी होती है और हमेशा होती रहेगी।
"बदलाव किसी के रंग में नहीं अपनी सोच में लाऐं, क्यूंकि खूबसूरती की कोई परिभाषा नहीं होती"
we have to break the stereotype.
"say no to colour discrimination"
Great and inspirational
ReplyDeleteमहत्वपूर्ण यह भी है की व्यक्ति स्वयं को स्वीकार करे तथा वह जो है उसपर गर्व करे।जबतक वह स्वयं उस चीज को बुरा मानता रहेगा तबतक उसे कष्टों का सामना करना परेगा परन्तु ज्योंहीं वह उसे स्वीकार कर उसपर गर्व करना प्रारंभ कर देगा उसे दु:ख नहीं होगा।काले कहने को बुरा क्यूँ माने???गोरे को अगर कोई गोरा कहता है तब तो वह बुरा नहीं मानता अपितु खुश होता है क्योंकी वह अपने रंग पर गर्व करता है।उसी प्रकार काले मनुष्य को भी स्वयं के रंग पर गर्व करना चाहिए कि वह काला है।वह काला जिसके बीना सफेद का कोई अस्तित्व नहीं,वह काला जिसे स्वयं देवों के देव महादेव,जगत जननी माँ काली और कृष्ण कन्हैया ने धारण किया है।यह तो केवल रंग मात्र है और रंग कोइ बुरा नहीं होता।फूल चाहे सफेद हो या नीला वह तो सुन्दर हीं होता है।जिसप्रकार गाय सफेद हो,काली हो या चीतकबरी वह पूजनीय है ,हम उनमे रंगभेद नहीं करते अपितु केवल श्रध्दा प्रकट करते हैं क्योंकी उनका पहचान रंग से नहीं बल्कि उनके गुण से है जो अमृत समान दुग्ध प्रदान करना है। ठिक उसी प्रकार मनुष्य का भी पहचान,उनका आदर,सम्मान उनके गुण,उनके व्यवहार से होता है नाकि उनके रंग से। और अगर कोइ ऐसा नहीं करता तो उससे स्वयं को नीरास करने की आवश्यकता नहीं है अपितु आप उसे क्षमा कर दिजिए क्योंकि अज्ञानता में परकर वह स्वयं के हीं आचरण को कलुषित करता है।
ReplyDeleteyou are a really good writer....keep up the good work. best of luck.
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